महादेव के जयकारों से गूंजी सतपुड़ा की वादियां: जुनारदेव से पचमढ़ी तक उमड़ा आस्था का सैलाब पैदल जा रहे भक्तों ने कहा हर हर महादेव
आमला। शिवभक्ति का कठिन मार्ग और पैरों में छालों के बावजूद चेहरों पर मुस्कान; कुछ ऐसा ही नजारा इन दिनों जुनारदेव से पचमढ़ी के रास्तों पर दिखाई दे रहा है। लाखों श्रद्धालु ‘पहली पायरी’ से अपनी यात्रा शुरू कर त्रिशूल लेकर महादेव के दरबार की ओर बढ़ रहे हैं। मान्यता है कि इन दुर्गम पहाड़ियों को पार कर जो भक्त बाबा भोलेनाथ को त्रिशूल अर्पित करता है, उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है। ऊबड़-खाबड़ रास्ते, घने जंगल और कड़ाके की ठंड भी भक्तों के उत्साह को कम नहीं कर पा रही है। हर कदम पर ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष से समूचा अंचल शिवमय हो गया है। प्रशासन और स्थानीय समितियों ने भी श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पुख्ता इंतजाम किए हैं।
छोटा महादेव अम्बा माई से शुरू होती दर्शन यात्रा: भक्ति का प्रथम द्वार
इस पैदल यात्रा का शुभारंभ छोटा महादेव और अम्बा माई के दर्शन के साथ होता है, जिसे यात्रा की ‘पहली पायरी’ माना जाता है। यहाँ भक्त सबसे पहले माता रानी का आशीर्वाद लेते हैं और फिर महादेव की गुफा में माथा टेककर अपनी लंबी और कठिन यात्रा का संकल्प लेते हैं। श्रृद्धालुओं की टोली अपने साथ विशेष रूप से तैयार किए गए पीतल और लोहे के भारी-भरकम त्रिशूल लेकर चलती है। इन त्रिशूलों को सजाया जाता है और पूरे रास्ते इनकी पूजा-अर्चना की जाती है। अम्बा माई मंदिर परिसर में भक्तों के रुकने और स्वल्पाहार के लिए विशेष भंडारों का आयोजन किया गया है। यहाँ से शुरू होने वाला सफर न केवल शारीरिक क्षमता की परीक्षा है, बल्कि अटूट विश्वास का प्रतीक भी है। रात के समय मशालों और टॉर्च की रोशनी में आगे बढ़ते भक्त किसी दिव्य उत्सव जैसा दृश्य उत्पन्न करते हैं।
मोवाड़ से बढ़ते कदम: तारा घाटी के दुर्गम रास्तों पर शिव भक्तों का इम्तिहान
यात्रा का सबसे चुनौतीपूर्ण पड़ाव मोवाड़ से शुरू होकर तारा घाटी की ओर जाता है, जहाँ प्रकृति अपनी सबसे कठिन परीक्षा लेती है। तारा घाटी का सफर अपनी खड़ी चढ़ाई और संकरे रास्तों के लिए जाना जाता है, लेकिन शिव भक्तों के लिए यह मार्ग भी सुगम प्रतीत होता है। मोवाड़ क्षेत्र में स्थानीय ग्रामीणों द्वारा जगह-जगह चाय, पानी और प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था की गई है, जो इस यात्रा को सुलभ बनाती है। भक्त नंगे पैर कंकड़-पत्थरों की परवाह किए बिना अपनी मंजिल की ओर बढ़ते रहते हैं। घाटी की ठंडी हवाएं और ऊंचे पहाड़ भक्तों के संकल्प को और अधिक मजबूती प्रदान करते हैं। यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा श्रद्धालुओं की सारी थकान मिटा देती है। हर साल मोवाड़ मार्ग से गुजरने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।
लाखों श्रद्धालुओं की आस्था: त्रिशूल चढ़ाकर मांग रहे खुशहाली की मन्नत
पचमढ़ी के चौरागढ़ शिखर तक पहुँचने के बाद इस यात्रा का समापन होता है, जहाँ लाखों श्रद्धालु अपने साथ लाए त्रिशूलों को अर्पित करते हैं। मंदिर परिसर में त्रिशूलों का एक विशाल अंबार लगा हुआ है, जो भक्तों की अटूट आस्था की गवाही देता है। आमला सहित आसपास के जिलों से आए भक्तों का कहना है कि बाबा के दरबार में मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। कोई परिवार की सुख-शांति के लिए तो कोई व्यापार और सेहत के लिए बाबा से गुहार लगा रहा है। महादेव के दर्शन के लिए घंटों लंबी कतारों में लगने के बावजूद भक्तों के चेहरे पर थकान के बजाय एक दिव्य संतोष नजर आता है। त्रिशूल अर्पण करने के बाद भक्त महादेव की भभूति लेकर वापस अपने गंतव्य की ओर लौटते हैं। यह पूरी यात्रा सांप्रदायिक सौहार्द और सेवा भावना की एक अनूठी मिसाल पेश करती है।










