आमला। ग्राम हरन्या में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को लेकर अब सियासी घमासान खुलकर सामने आ गया है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष द्वारा पिछले चार माह से लगातार किए जा रहे प्रयासों के बाद जैसे ही प्रशासन ने कार्रवाई तेज की, वैसे ही श्रेय लेने की होड़ शुरू हो गई। स्थानीय राजनीति में इस मुद्दे ने नया मोड़ ले लिया है, जहां मेहनत करने वाले को पीछे धकेलने और दूसरे को आगे लाने की चर्चाएं जोरों पर हैं। आमला के राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर तरह-तरह की बातें हो रही हैं। आमजन भी अब यह सवाल उठाने लगे हैं कि आखिर असली पहल किसकी थी और फायदा कौन उठा रहा है।
चार माह की मेहनत पर सवाल, अध्यक्ष को पीछे करने की कोशिश
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष ने बीते चार महीनों से अतिक्रमण के खिलाफ लगातार शिकायतें, ज्ञापन और अधिकारियों से मुलाकात कर कार्रवाई की मांग उठाई थी। कई बार जनसुनवाई में भी उन्होंने यह मुद्दा प्रमुखता से रखा। लेकिन जैसे ही प्रशासन हरकत में आया, कुछ अन्य लोग और राजनीतिक चेहरे सामने आकर खुद को इस कार्रवाई का श्रेय देने लगे। इससे अध्यक्ष समर्थकों में नाराजगी बढ़ गई है। उनका कहना है कि सुनियोजित तरीके से अध्यक्ष को पीछे करने की साजिश रची जा रही है। इस पूरे घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर भी हलचल बढ़ा दी है और कार्यकर्ता खुलकर विरोध जता रहे हैं।
श्रेय की राजनीति से गरमाया माहौल, कार्यकर्ताओं में आक्रोश
अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई जहां प्रशासनिक दृष्टि से जरूरी मानी जा रही है, वहीं अब यह पूरी तरह राजनीतिक रंग ले चुकी है। श्रेय लेने की होड़ में नेताओं के बीच खींचतान साफ दिखाई दे रही है। समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने इसे मेहनत का अपमान बताया है और खुले तौर पर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि अगर इसी तरह मेहनत करने वालों को दरकिनार किया जाएगा तो भविष्य में कोई भी जनहित के मुद्दों को लेकर आगे नहीं आएगा। वहीं दूसरी ओर, कुछ लोग इसे सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया बताकर विवाद को कम करने की कोशिश में लगे हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म, जनता देख रही तमाशा
पूरे घटनाक्रम को लेकर शहर एव ग्रामीण इलाकों की राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर लगातार जारी है। चौराहों से लेकर बैठकों तक हर जगह इसी मुद्दे पर बहस हो रही है। आम जनता भी इस सियासी खींचतान को ध्यान से देख रही है और अपने-अपने तरीके से प्रतिक्रिया दे रही है। कुछ लोग इसे नेताओं की आपसी प्रतिस्पर्धा मान रहे हैं, तो कुछ इसे जनता के मुद्दों से ध्यान भटकाने की रणनीति बता रहे हैं। फिलहाल स्थिति यह है कि अतिक्रमण का मुद्दा अब केवल प्रशासनिक नहीं रह गया, बल्कि पूरी तरह से राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई बन चुका है, जिसका असर आने वाले समय में और गहराने की संभावना है।










