पिता के वचन की मर्यादा के लिए राम ने स्वेच्छा से चुना वनवास रामकथा में छठे दिन छलका वियोग का सागर
आमला। हनुमान मंदिर परिसर नांदपुर में चल रही श्रीरामकथा के छठे दिन रविवार को कथा का वातावरण अत्यंत भावुक हो गया। कथावाचक पंडित स्वामी धीरेंद्र आचार्य ने अयोध्या के वियोग प्रसंग का सजीव वर्णन किया। उन्होंने बताया कि जिस अयोध्या में राजतिलक की खुशियां थीं, वहीं पलभर में विरह की छाया छा गई। माता कैकेई द्वारा मांगे गए दो वरदानों के कारण मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने पिता दशरथ के वचनों की रक्षा के लिए स्वयं वनवास स्वीकार किया। यह प्रसंग किसी राजनीतिक मजबूरी का नहीं, बल्कि धर्म, त्याग और सत्य की सर्वोच्च मिसाल है। कथा के दौरान श्रोताओं ने अनुभव किया कि श्रीराम का निर्णय कर्तव्यबोध से प्रेरित था। लक्ष्मण और माता सीता के साथ राम का वनगमन आदर्श पारिवारिक मूल्यों का जीवंत चित्र बन गया। आचार्य की ओजस्वी वाणी ने श्रोताओं को त्रेता युग में पहुंचा दिया।
गंगा पार कर चित्रकूट की ओर प्रस्थान, त्याग का अनुपम आदर्श
कथा में आगे वर्णन हुआ कि भगवान श्रीराम माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ गंगा नदी पार कर चित्रकूट की ओर प्रस्थान करते हैं। यह यात्रा उनके चौदह वर्षों के वनवास का महत्वपूर्ण पड़ाव थी। चित्रकूट का क्षेत्र प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक शांति से परिपूर्ण बताया गया। घने जंगल, निर्मल नदियां और हरियाली ने प्रभु को साधना और आत्मचिंतन का अवसर दिया। स्थानीय जनमानस ने राम, सीता और लक्ष्मण का श्रद्धा से स्वागत किया। राम की सरलता, सीता की शीलता और लक्ष्मण की निष्ठा लोगों के हृदय में बस गई। यहीं भगवान राम ने जीवन के आदर्श और धर्मोपदेश दिए। कथा सुनकर श्रद्धालु भावविभोर होते नजर आए।
भजन-संगीत में झलका भक्तिभाव, मंथरा-कैकेई प्रसंग ने किया व्यथित
रामकथा के दौरान भजन-संगीत की प्रस्तुति ने माहौल को भक्तिमय बना दिया। योगेश महाराज और उनके दल ने भक्ति गीतों की ऐसी सुमधुर प्रस्तुति दी कि श्रद्धालु झूम उठे। कई भक्त भजनों पर नृत्य कर अपनी आस्था प्रकट करते दिखे। योगेश महाराज ने कहा कि ऐसे धार्मिक आयोजन समाज में एकता और सहयोग की भावना को मजबूत करते हैं। वहीं कथा में मंथरा-कैकेई प्रसंग का वर्णन भी किया गया। आचार्य ने बताया कि मंथरा के भड़काने पर कैकेई का विवेक डगमगा गया। भरत के भविष्य के भय से उसने दशरथ से दो वरदान मांगे। एक में भरत को राजा और दूसरे में राम को चौदह वर्ष का वनवास दिलवाया। यह प्रसंग सुनकर श्रोताओं की आंखें नम हो गईं।











